दो दिन पूर्व रांची के बुंडू में नाक्साल्वाद का नया चेहरा देखने को मिला.उस दिन नक्सलियों के एक छोटे ग्रुप ने बाराहातु गाँव के एक तीन साल की लड़की समेत चार लोगों की हत्या कर दी .कारन था नक्सलियों के खिलाफ ग्रामीणों का उठ खड़ा होना . पिछले एक दशक से नक्सलियों के खौफ का दंश झेल रहे इन ग्रामीणों का कसूर सिर्फ इतना था की हाल के दिनों में जब पोलिसे इन नक्सलियों के खिलाफ भादी पड़ी तो ग्रामीणों ने भी उनका साथ दिया.जो नक्सलियों को पसंद नहीं आया परिणाम चार बेगुनाह लोगोह की हत्या ताकि ग्रामीणों में नक्सलियों का खौफ कायम रहे,नक्सलियों के खिलाफ पुलिस के साथ कोई ग्रामीण खड़ा होने की जुर्रत नहीं करे . इन सभी घटनाक्रमों में यह समाज में नहीं आया की कि तीन साल की लड़की की भूमिका नक्सलियों के विरोध में किस प्रकार की है जो उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़े . मेरा यह सवाल यदि नक्सलियों से है तो यही सवाल उन पुलिस के अधिकारिओं से भी है जो राज्य में पिछले एक साल से माओवादिओं के खिलाफ एंटी नक्सल ऑपरेशन तो चला रहे हैं लेकिन इस ऑपरेशन में आम लोगों की भूमिका क्या है इसका खुलासा आज तक नहीं हो पाया. पिछले चार सालों से झारखण्ड में हूँ और अब तक सैकड़ों नक्सली घटनाओं के गवाह भी बना लेकिन नक्सलवाद इस चेहरे से अब तक सामना नहीं पड़ा था , माओवाद विचारधारा को बहुत नहीं जानता लेकिन एक इंसान और अपने अन्दर कुछ इंसानियत होने के नाते यह जरुर समझ सकता हूँ कि छोटे बेगुनाह बच्चो की जान लेकर किस तरह के सामाजिक व्यवस्था का निर्माण यह माओवादी करना कहते हैं. राजनितिक नेताओं की तरह मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि माओवादी अपने रास्ता से भटक गए हैं और उन्हें इस रास्ते को छोड़ वापस लौट लाना चाहिए लेकिन उनसे एक अपेक्षा तो है ही कि क्या अब समय ऐसा नहीं आ गया है कि अपने विचारधारा को समय और उस भारतीय संस्कृति की तराजू में तौले ताजो हमें जियो और जीने दो का सिद्धांत देती है ताकि इस तरह से फिर कोई बचपन व्यर्थ न चला जाये .
आप जैसे कुछ लोगों का सुझाव जानना चाहूँगा, पहली कोशिश है अपने भावनाओ को व्यक्त करने की उसमे यदि कोई गलती हो गयी हो तो माफ़ कीजियेगा
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