एक लम्बे अरसे के बाद पूरे देश को बिहार के बारे में सार्थक चर्चा करते हुए सुना. इस चर्चा में में न तो किसी की दबंगई की कहानी थी और न ही किसी के उलजुलूल वक्ताब्यों की और न ही किसी की व्यक्तिगत उपलब्धि की . यह चर्चा थी सम्पूर्ण बिहार के उन लोगों की, जिसकी पहचान कुछ हद तक बिहारी की बनी हुई है लेकिन आज इसी बिहारियों ने भारतीय लोकतंत्र के २१वी शताब्दी के पहले दशक का अंत बड़े ही शानदार तरीके से कर दिया. आज बिहार के एक नए चेहरे का आगाज हुआ एक ऐसे चेहरे का जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी कम से कम अभी तो नहीं ही लेकिन ऐसा हुआ और यह कर दिखाया बिहार की जनता ने . मौका था बिहार विधानसभा चुनाव परिणामो का , तमाम आशंकाओं और अनुमानों को झुठलाते हुए बिहार की जनता ने एक ऐसा चुनाव परिणाम देश के सामने रखा जिसकी उम्मीद तथाकथित रूप से उन लोगों और वर्गों को नहीं थी जो आज भी बिहार को जातियों और सम्प्रदायों में बंटा हुआ मानते हैं. यह उम्मीद उन राजनितिक पंडितों को भी नहीं थी जो जनता के नब्ज को पढने का हमेशा दावा करते हैं और न ही उन नेताओ को जो जनता को अपना गुलाम समझते हैं और उनके वोट को अपनी जागीर, जिनके पक्ष में यह फैसला आया वह भी जनता के इस समझ के सामने नतमस्तक दिखे . लोकतंत्र में जनता ही सर्वश्रेष्ट है इस नीति को बरक़रार रखते हुए बिहार के मतदाताओं ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एक बार फिर पांच साल के लिए बिहार की बागडोर सौंप दी. २४३ सीटों में से २०६ सीट राजग गठबंधन को देकर बिहार के मतदाताओं ने साबित कर दिया की वह भी विकास कि बात समझती है अब उसपर जात-पात कि राजनीती में फंसे रहने का आरोप नहीं लगाया जा सकता चुनाव परिणाम के पूर्व सभी दल और लोग चाहे -अनचाहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एक और पारी दिए जाने के पक्षधर तो थे लेकिन इस एतिहासिक और निर्णायक विश्वास के साथ नहीं. लोगों के विश्वास का ही परिणाम है कि पिछले दो दशकों में बिहार का पर्याय होने का दावा करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव अपनी पार्टी के लिए विपक्षी दल का दर्जा भी नहीं हासिल कर सके .
बिहार का चुनाव परिणाम कई मायनो में एतिहासिक भी साबित हुआ है. गठबंधन की राजनीति के पिछले दो दशकों के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी गठबंधन को दो-तिहाई ही नहीं तीन-चौथाई से भी ज्यादा सीट मिले. पहली बार ऐसा हुआ है जब केंद्र में पिछले छःह साल से काबिज कांग्रेस का बिहार में प्रदर्शन इतना निराशाजनक हुआ है. बीजेपी के राजनितिक इतिहास में पहली बार ही यह हुआ कि पार्टी को किसी चुनाव में नब्बे फीसदी से ज्यादा सफलता मिली हो . भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अब तक किसी पार्टी को किसी चुनाव में इतनी बड़ी सफलता नहीं मिली. बिहार के जनमानस में आया यह बदलाव बाहरी लोगों के लिए वाकई चौंकाने वाला हो सकता है. बाहरी लोगों के लिए इसलिए क्योंकि इस वर्ग ने उस बिहार को नहीं देखा जिसका निर्माण पिछले चार-पांच सालों से चल रहा था . बिजली, सड़क आदि बुनियादी चीजों में जो बदलाव पिछले पांच सालों में हुआ वह पिछले पच्चीस सालों में नहीं हुआ था. बिहार के सन्दर्भ में विकास की नई गाथा लिखी गई
बिहार के नए चेहरे की शुरुआत बेशक आज नीतीश के चुनावी सफलता को माना जाए लेकिन इसकी नीव तो पांच साल पहले ही उस समय रख दी गई थी जब लालू विरोध और एक नए बिहार के निर्माण का वोट नीतीश को मिला था, आज तो सिर्फ उस नीव पर इमारत खड़ी की गई ताकि बिहार को एक और नई पहचान मिल सके. यह पहचान है राजनितिक जागरूकता का ,पिछड़े और जातियों में बंटे समाज से दूर विकास के नाम पर वोट करने वालों का, विकास के बारे में सोचने वालों का .
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